Wednesday, 19 November 2014

बग़ैर राह देखे भी रहना , क्या नसीब है,अब. 

उसका जाना तो फिर से आने का इंतज़ार था ,

पर उसका चलेजाना ही उम्रभर का खालीपन है,अब. 
वो आता, जाता था, मेरे घर,
कभी देर तक रुकता, कभी आता और चला जाता,
उम्र छोटी थी , और घर भी छोटा था,उसका 
न रिश्ते थे, ना पैसे थे,न ही उसका स्कूल ही रहता था,
चीज़ो की कमी उसको नहीं रुलाती थी,कभी 
वो माँगनेवाला था, मांगलेता था, जो चाहिए था उसे. 
न मिले ना सही, ना मिले तो भी ठीक है, 
मेंहनत करता था, अपने उम्र का नहीं था वो, 
उम्र क्या थी उसकी उसे ये भी नहीं पता था,
कितने ही ऐसे बच्चे होंगें हमारे आस- पास,
पर वो कुछ तो अलग था उनके बीच में,
घर आता था मेरे , दूध का पैकट लेकर,
और फिर कितनी ही बातें रहती थी उसकी,
कब तक रुकता था ये घड़ी को भी मालूम न हो,
कितनी ही यादें है अब , याद करते रहने को,
मग़र लौटके आएगा कौन जो अब रहा ही नहीं,
बग़ैर राह देखे भी रहना , क्या नसीब है,अब. 

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