Tuesday, 9 December 2014

दिल की कहें -


" ना मिला सुकून उमरभर फिर भी, एक चाहनेवाला था, ये काफी है। "

" चलना साथ में आसान कब था, पर रुकना भी किसी  की खातिर मुश्किल है,
   कुछ देर ही सही,रूक-कर तुमने, अपनी चाहत को और भी चाहत कर दी। "

" सच तो ये है के,वो भी नहीं रहा है वो, और मैं भी बदल गया हूँ अब। "

" कमी तुम में भी है ये बात सही है , पर कौन करे ग़मज़दा उसको, जिसे,
  दिल ने चाहा हो कभी।  "

" लिख तो सकता हूँ, मैंने पी  है, पर अगर, तुम होते,
  तो मैं बातें करता , लिखता क्यूँकर।  "

" शौक़ क्या है, क्या कहूँ, किसे कहूँ, और क्यों कर, 
  उसने पूछा नहीं , हमने बताया भी नहीं।  " 

" उसने गिराया मुझे हर बार, बार- बार , पर, 
  रेंगना, मेरी आदत थी और मैं रुका न कहीं। "


Wednesday, 19 November 2014

बग़ैर राह देखे भी रहना , क्या नसीब है,अब. 

उसका जाना तो फिर से आने का इंतज़ार था ,

पर उसका चलेजाना ही उम्रभर का खालीपन है,अब. 
वो आता, जाता था, मेरे घर,
कभी देर तक रुकता, कभी आता और चला जाता,
उम्र छोटी थी , और घर भी छोटा था,उसका 
न रिश्ते थे, ना पैसे थे,न ही उसका स्कूल ही रहता था,
चीज़ो की कमी उसको नहीं रुलाती थी,कभी 
वो माँगनेवाला था, मांगलेता था, जो चाहिए था उसे. 
न मिले ना सही, ना मिले तो भी ठीक है, 
मेंहनत करता था, अपने उम्र का नहीं था वो, 
उम्र क्या थी उसकी उसे ये भी नहीं पता था,
कितने ही ऐसे बच्चे होंगें हमारे आस- पास,
पर वो कुछ तो अलग था उनके बीच में,
घर आता था मेरे , दूध का पैकट लेकर,
और फिर कितनी ही बातें रहती थी उसकी,
कब तक रुकता था ये घड़ी को भी मालूम न हो,
कितनी ही यादें है अब , याद करते रहने को,
मग़र लौटके आएगा कौन जो अब रहा ही नहीं,
बग़ैर राह देखे भी रहना , क्या नसीब है,अब. 

Monday, 29 September 2014


जो भी चेहरा दिखा मुझ को,
तुमसे मिलता -जुलता लगा मुझको।


भूल जाओ मुझको या फिर याद कारो, मर्ज़ी रही'
करो जो भी दिल से निभाना अबकी।


दिन बनता था मेरा कभी तुमसे मिलकर,
और अब दिन गुज़ारता हूँ मैं।


चेहरे तो है तमाम जो दोसतों से लगे,
पर जो भी चेहरा दिखा, तुम जैसा ही दिखा।


भीड़ में खोगया तो सुकून मिला,वरना, 
तुमको कितना याद करता मैं।    




झूठ को जब भी साँसे मिली है,
कितना जिया है मैने, और तुमने भी,
जब-जब इसका चेहरा दिखा है,जितना दिखा है, 
कितना बेरंग कर गया है,
दौड़ कर छुप जाओ पर्दो मे,या फिर मूंद लो आँखे अपनी,
दिल को मालूम है, तो दर्द भी महसूस होगा,
जीलो या फिर याद रखो, मर्ज़ी अपनी.

कुछ और

जो झूठ, सच समझ कर जिया मैने, 
नाज़ाने मैने क्या समझा,
किस तरह भूल जाता मैं,
के तुम दिल मे ही नही दिमाग़ो मे भी बस गये थे,
के बस तुम से ही पहचान लगने लगी थी अब,
के बस तुम्हारा होना ही मुकमल करता था मुझे,
के बस तुम नही थे तो मैं भी नही बचा था,
तुम भी हो, और मैं भी बचा हूँ,पर सच है की जाता नही अब,
तुम ही तो हो तुम्हारा झूठ और तुम्हारा सच.
या फिर कुछ और.. क्या कहूँ मैं अब ..  

Friday, 26 September 2014

वो जीता है

बस चल पड़ा है वो कोई अरमान लिए ,
क्या है अरमान ये तो नहीं जनता है, 
जान लेने से ही रुकना पड़ताह, ये भी सच है,  
थक जाता वो की सोचता, ग़ैर और अपनों का फ़ासला, 
मालूम होता उसे की पाना क्या है;
पर फिर ये भी कि, क्या है उसे खो देना,
बस अगर जानता वो की उसके अरमान क्या है, 
जानता  है की सबो को कभी नहीं होने देगा कमतर खुद से,
जो भी उससे मिलेंगे राहगीर रसतो पे,
छाँव क्या बनपायेगा किसी मुसाफ़िर का, क्या मालूम,
पर हाँ उसको अपने राहपे चलने देगा पीछे रहके,
कौन समझहा है अपने सिवा किसी गैर को, की राह उसकी भी मुश्किल रही होगी,
पर जानते है वो भी झूठी है दुनिया उनकी ,
जहान बस वो ही सुनते हैं और कहते है बातें अपनी,
अरमां नहीं है उसके बस वो जीता है अपने दिल कि. 

Thursday, 4 September 2014

बस थक के जहाँ भी बैठा हूँ, गली उसकी ही रही।    


सब छूट ही जाना है बस वक़्त लगेगा थोड़ा '
यूँ आगे बढ़ना भी कोई बात हुई,
कौन है जो चाहता  हो, की ठिकाने बदले ,
ठिकानो को बदलें, उसकी मजबूरी होगी,
रहता है दिल में तो रहने देता , 
अब दमाग़ो मे भी उसका  चेहरा होता है ,
बदरंग होता  नहीं कोई रिश्ता लेकिन , 
रंग उतर जाता हैं जीते -जीते ,
बदलना कहाँ आॅंसा हुआ है उसका ,जो मिला हो कभी दिल से,
बदलते फिर भी हैं लोग जो  नकाबों में मिलें,
ख़तम होगा भी और साथ भी रहा मेरे ,
ऐसे ही रहा है साथ वो अजनवी बनके,
कौन रुकता है जहाँ खाली हो मकाँ,और,
दिल की बात न कोई सुनने वाला न कहने वाला,
मैंने भी सुना है कि उसने पूछा है हाल मेरा,
बस जो ज़िन्दगी बीत भी जायें इतने  भर से,
पूछ लेता उससे हँसी का सबब मैं भी,
खाली पड़ी आँखों से जो न आँखे मिलती,
अब उससे मेरा वास्ता कोई भी नहीं, 
बस थक के जहाँ भी बैठा हूँ, गली उसकी ही रही।    


Wednesday, 3 September 2014

A Drunken Man

Sometime ago, I met my life,
he was drunk and high,
I asked him, 'why you are so happy',
Life replied, 'I met my goal of life"
Goal of life, I wanted to know more, 
Life said, nothing here to know,
'just get drunk and you'll grow",
'keep your mouth shut while speak with fools",
'keep your heart open ,if and when,you find a friend',
I was glad to hear my life, I thought to have the same goal in my life,
I thanked him from bottom of my heart, 
He laughed and revoked,  
'one more thing you must know", Life said, 
'don't copy others, don't love deep, just meet people n soon them forget'',
'bed memory is blessing of god, don't try to remember people whom loved', 
'walk with one who wants to pace with you, n don't run to catch who is faster than you,'
I thanked him after hearing some more, again he stopped me and said,
'move on soon if you find wrong place', 
'n don't blame others who have changed'
'you are not cursed to remain the same' 
I now got confused so I paused, 
then suddenly he fallen on the ground, and said,
'never believe a drunken man, at all.' 

हँसते  चेहरें ,

ख़ौफ़  खता हूँ उसके हँसते चेहरे से ,
रोती  आँखों  का सच  तो सुना है मैंने ,
हँसते रहने का हुनर अच्छा  है 
और चेहरे की हंसी भी एक मिसाल  ही ,
 फिर भी चाहता हूँ की उसको रोता देखूं,
पोछ सकूँ आँसू उसके, दिल से लगाऊँ उसके ग़म ,
कितना रोता होगा दिल उसका  भी ,
बेहतर है की वो रोना सीखे, 
ऐसे साथ मिले जो आँसू पोछें 
हँसी  सुनने  वाले तो सभी ग़ैर ही हैं ,ग़ैर ही होंगे,
उसको कोई अपना भी मिले, की वो रोना चाहे।

तस्वीरें 

तस्वीरे कहा बोल पाती हैं, ज़िंदगी काश की होती एक तस्वीर ही, 
मुस्कराती, साथ होते कितने ही दोस्त, हाथो मे हाथ लिये, कंधो पे सिर, 
खिलखिलाते सबके चेहरे, बस अगर ज़िंदगी होती एक तस्वीर, 
टाँग देते किसी कोने मे घर के, ऐसे ही सभी के खिलते चेहरो को, 
कहाँ होता दर्द फिर इन  मुस्कराहटों में, 
जिंदगी अगर तस्वीर जैसी हो पाती, 
फिर भी जिसको हुनर होता आँखों को पढ़ सकने का, 
देखही लेता सबके हँसते चेहरो का ग़म, 
तस्वीर फिर बदरंग सी हो जाती, 
उन्हीं हँसते चेहरो का ग़म उनकी आँखो मे उतर आता अगर.. 
फिर भी, ज़िंदगी अगर तस्वीर भर बन के रह पाती.

Monday, 1 September 2014

भाईचारा 

कितना ही थोड़ा गया ये भाईचारा,दीवार उठायी गई कई-बार या बार बार, 
उठती रहेंगी,बनती रहेंगी खाईयाँ;कई चेहरे बनेंगे बाँटने वाले,कई बटने वाले;
रंग कभी,कभी पैसो की,कभी पेशो की,तो कभी पहनावा ही बांटता है कभी, 
मेरा मज़हब, कभी मेरी पूजा, कभी टिका तो कभी ताबीज़ ही, 
कही पंडित तो कही मौलवी;
भाईचारा, हर बार मिटा भी दो मुझे मै हूँ अभी भी बाकि, दिलो में, 
जो गर मैं नहीं तो, कौन रहा फिर बच सका है ,
कितना भी दूर करो मुझे दिलो से, तुम में अभी भी है बचा, ये भईचार. 
एक बच्चा हमेशा चाहता है साथ खेलना भर, फिर तुममे भी तो रहा है, एक बच्चा कभी,क्यों भूलते हो;
की बाटना है खेल कुछ का, और मेल है हर दिलों की एक सी ख़्वाहिश,
बस तुम निभावो भाईचारा, क्यों की, इसकी भी दो कड़ी है, और आओ थाम लो इसे, है जिसने भी छोड़ी,
भाईचारा