Friday, 26 September 2014

वो जीता है

बस चल पड़ा है वो कोई अरमान लिए ,
क्या है अरमान ये तो नहीं जनता है, 
जान लेने से ही रुकना पड़ताह, ये भी सच है,  
थक जाता वो की सोचता, ग़ैर और अपनों का फ़ासला, 
मालूम होता उसे की पाना क्या है;
पर फिर ये भी कि, क्या है उसे खो देना,
बस अगर जानता वो की उसके अरमान क्या है, 
जानता  है की सबो को कभी नहीं होने देगा कमतर खुद से,
जो भी उससे मिलेंगे राहगीर रसतो पे,
छाँव क्या बनपायेगा किसी मुसाफ़िर का, क्या मालूम,
पर हाँ उसको अपने राहपे चलने देगा पीछे रहके,
कौन समझहा है अपने सिवा किसी गैर को, की राह उसकी भी मुश्किल रही होगी,
पर जानते है वो भी झूठी है दुनिया उनकी ,
जहान बस वो ही सुनते हैं और कहते है बातें अपनी,
अरमां नहीं है उसके बस वो जीता है अपने दिल कि. 

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