कुछ और
जो झूठ, सच समझ कर जिया मैने,
नाज़ाने मैने क्या समझा,
किस तरह भूल जाता मैं,
के तुम दिल मे ही नही दिमाग़ो मे भी बस गये थे,
के बस तुम से ही पहचान लगने लगी थी अब,
के बस तुम्हारा होना ही मुकमल करता था मुझे,
के बस तुम नही थे तो मैं भी नही बचा था,
तुम भी हो, और मैं भी बचा हूँ,पर सच है की जाता नही अब,
तुम ही तो हो तुम्हारा झूठ और तुम्हारा सच.
या फिर कुछ और.. क्या कहूँ मैं अब ..
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