तस्वीरें
तस्वीरे कहा बोल पाती हैं, ज़िंदगी काश की होती एक तस्वीर ही,मुस्कराती, साथ होते कितने ही दोस्त, हाथो मे हाथ लिये, कंधो पे सिर,
खिलखिलाते सबके चेहरे, बस अगर ज़िंदगी होती एक तस्वीर,
टाँग देते किसी कोने मे घर के, ऐसे ही सभी के खिलते चेहरो को,
कहाँ होता दर्द फिर इन मुस्कराहटों में,
जिंदगी अगर तस्वीर जैसी हो पाती,
फिर भी जिसको हुनर होता आँखों को पढ़ सकने का,
देखही लेता सबके हँसते चेहरो का ग़म,
तस्वीर फिर बदरंग सी हो जाती,
उन्हीं हँसते चेहरो का ग़म उनकी आँखो मे उतर आता अगर..
फिर भी, ज़िंदगी अगर तस्वीर भर बन के रह पाती.
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