Monday, 1 September 2014

भाईचारा 

कितना ही थोड़ा गया ये भाईचारा,दीवार उठायी गई कई-बार या बार बार, 
उठती रहेंगी,बनती रहेंगी खाईयाँ;कई चेहरे बनेंगे बाँटने वाले,कई बटने वाले;
रंग कभी,कभी पैसो की,कभी पेशो की,तो कभी पहनावा ही बांटता है कभी, 
मेरा मज़हब, कभी मेरी पूजा, कभी टिका तो कभी ताबीज़ ही, 
कही पंडित तो कही मौलवी;
भाईचारा, हर बार मिटा भी दो मुझे मै हूँ अभी भी बाकि, दिलो में, 
जो गर मैं नहीं तो, कौन रहा फिर बच सका है ,
कितना भी दूर करो मुझे दिलो से, तुम में अभी भी है बचा, ये भईचार. 
एक बच्चा हमेशा चाहता है साथ खेलना भर, फिर तुममे भी तो रहा है, एक बच्चा कभी,क्यों भूलते हो;
की बाटना है खेल कुछ का, और मेल है हर दिलों की एक सी ख़्वाहिश,
बस तुम निभावो भाईचारा, क्यों की, इसकी भी दो कड़ी है, और आओ थाम लो इसे, है जिसने भी छोड़ी,
भाईचारा 

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